नई दिल्ली, 14 मार्च 2020: 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक WhatsApp message तेज़ी से viral हुआ था — एक धार्मिक स्थान पर कथित हमले की झूठी खबर, जिसके साथ एक पुरानी, किसी और देश की तस्वीर थी। अगले 48 घंटों में वो message 2 करोड़ से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। कई जगह हिंसा हुई। और चुनाव में उस "झूठ" ने एक खास रंग छोड़ा। यह कोई कल्पना नहीं है — यह documented सच्चाई है। आज जब हम सोशल मीडिया पर scroll करते हैं, तो हमें नहीं पता कि कौन सी खबर सच है, कौन सी झूठ है, और कौन सी खबर एक राजनीतिक agenda का हथियार है।
IT Cell, Troll Army और Manufactured Consent
भारत में लगभग सभी बड़े राजनीतिक दलों के "IT Cell" हैं — एक ऐसी फौज जो 24 घंटे social media पर narrative बनाने का काम करती है। Oxford Internet Institute की एक रिपोर्ट में भारत को उन देशों में शामिल किया गया है जहाँ "Computational Propaganda" — यानी automated bots और coordinated networks से झूठी खबरें फैलाना — सबसे ज़्यादा होता है। यह काम बेहद sophisticated तरीके से होता है — पहले एक छोटी, भड़काऊ बात कही जाती है, फिर उसे हज़ारों fake accounts आगे बढ़ाते हैं, और देखते ही देखते वो एक "trending topic" बन जाता है जिस पर mainstream media भी खबर बनाने लगती है।
एल्गोरिद्म का जाल — आप वही देखते हैं जो आप देखना चाहते हैं
Facebook, Instagram, YouTube — सभी के एल्गोरिद्म इस तरह बने हैं कि वो आपको वही content दिखाएंगे जो आपको "engage" करे। और जो content सबसे ज़्यादा engage करती है, वो है — गुस्सा, डर और नफरत। इसलिए नफरत फैलाने वाली खबर, एक balanced खबर से 6 गुना ज़्यादा तेज़ी से viral होती है — यह MIT की research है। इसका नतीजा है "filter bubble" — आप एक ऐसे virtual reality में जी रहे हैं जहाँ आपके जैसे सोचने वाले ही हैं, और इसलिए आपको लगता है कि "सारी दुनिया" यही सोचती है।
Media analyst और 'इंडियन एक्सप्रेस' की पूर्व संपादक शेखर गुप्ता कहते हैं— "भारत का मीडिया लोकतंत्र अब एक paradox है — ज़्यादा आवाज़ें हैं, लेकिन कम सच है। जब हर कोई broadcaster बन जाए और कोई editor न रहे, तो chaos ही होगा।"
हम क्या कर सकते हैं?
सबसे पहला कदम है — हर खबर को forward करने से पहले एक बार verify करना। Fact-checking websites जैसे Alt News, Boom Live, और Vishvas News का इस्तेमाल करना। दूसरा कदम है — अपना "information diet" बदलना, यानी सिर्फ वो sources follow न करें जो आपकी बात मानते हों। और तीसरा, सबसे ज़रूरी — बच्चों को स्कूल से ही "Media Literacy" सिखाना होगी, जो उन्हें सच और झूठ में फर्क करना सिखाए।
क्या आपने कभी किसी fake news को सच मानकर आगे बढ़ाया और बाद में पछताया? सोशल मीडिया पर झूठी खबरों से लड़ने का आपका तरीका क्या है? हमें बताइए।