नई दिल्ली/श्रीनगर, 5 अगस्त 2019: पिछले 48 घंटों से पूरा देश एक अजीब सी बेचैनी और रहस्यमयी सन्नाटे में जी रहा था। अमरनाथ यात्रा अचानक रोक दी गई थी, पर्यटकों को तुरंत घाटी छोड़ने का आदेश दे दिया गया था, और रातों-रात अर्धसैनिक बलों की हजारों टुकड़ियां कश्मीर की सड़कों पर तैनात कर दी गई थीं। हर किसी के मन में बस एक ही सवाल था—"आखिर होने क्या वाला है?" और फिर, सोमवार की सुबह 11 बजे, राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने एक ऐसा संकल्प पेश किया जिसने न केवल भारतीय संसद को हिला दिया, बल्कि 70 साल पुराने इतिहास को एक झटके में मिटा दिया। अपनी कड़क आवाज़ में उन्होंने ऐलान किया कि राष्ट्रपति के आदेश से संविधान की धारा 370 (Article 370) के सभी खंड, जो जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देते थे, तत्काल प्रभाव से निष्प्रभावी कर दिए गए हैं। यह खबर जंगल की आग की तरह फैली और पूरा देश टीवी स्क्रीन्स से चिपक गया, यह विश्वास करने के लिए कि क्या वाकई "एक देश, एक विधान, एक निशान" का सपना सच हो गया है?
संसद में हंगामा और "जान दे देंगे" वाला जोश
जैसे ही अमित शाह ने बिल पेश किया, विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। पीडीपी (PDP) के सांसदों ने संविधान की प्रतियां फाड़ने की कोशिश की, जिन्हें मार्शलों ने बाहर का रास्ता दिखाया। लेकिन अमित शाह का आत्मविश्वास देखने लायक था। जब कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने कश्मीर को "संयुक्त राष्ट्र का मुद्दा" बताने की कोशिश की, तो शाह ने उन्हें बीच में ही टोकते हुए उंगली दिखाकर वह ऐतिहासिक बयान दिया जो अब हर बच्चे की जुबान पर है— "आप क्या बात कर रहे हैं? जम्मू-कश्मीर के लिए हम जान दे देंगे! अक्साई चिन भी इसमें शामिल है और पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) भी!" उनके इस बयान ने सदन का माहौल पूरी तरह बदल दिया। इस बिल के पास होते ही जम्मू-कश्मीर अब राज्य नहीं रहा, बल्कि उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories)—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में बांट दिया गया है। लद्दाख के लोगों की दशकों पुरानी मांग पूरी हो गई, और संसद में लद्दाख के सांसद जामपांग शेरिंग नामग्याल का भाषण सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
कश्मीर में कर्फ्यू और संचार ठप (Blackout)
जहां दिल्ली में जश्न मनाया जा रहा था और लोग सड़कों पर मिठाइयां बांट रहे थे, वहीं कश्मीर घाटी पूरी तरह से दुनिया से कट चुकी थी। मोबाइल इंटरनेट, लैंडलाइन और केबल टीवी—सब कुछ बंद था। पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला को नजरबंद कर दिया गया है। श्रीनगर की डल झील के किनारे सन्नाटा पसरा हुआ है और लाल चौक पर सुरक्षाबलों का सख्त पहरा है। सरकार का तर्क है कि खून-खराबा रोकने के लिए यह 'संचार बंदी' (Communication Blackout) जरूरी थी, लेकिन स्थानीय लोगों के दिलों में अनिश्चितता और डर का माहौल है। यह एक ऐसा फैसला है जिसने घाटी की डेमोग्राफी और राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया है। अब कोई भी भारतीय कश्मीर में जमीन खरीद सकता है, वहां बस सकता है और वहां के सरकारी नियमों में कोई भेदभाव नहीं होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शाम को राष्ट्र के नाम संदेश में कहा, "एक नई सुबह, एक नई शुरुआत। 370 एक ऐसी जंजीर थी जिसने कश्मीर के युवाओं को विकास से दूर रखा था। आज वो जंजीर टूट गई है। अब घाटी में गोलियां नहीं, बल्कि फिल्मों की शूटिंग होगी।"
निष्कर्ष: साहसिक कदम या लोकतांत्रिक चुनौती?
5 अगस्त 2019 की तारीख अब 15 अगस्त 1947 जितनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। समर्थकों के लिए यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के "बलिदान" का सम्मान है, तो विरोधियों के लिए यह "लोकतंत्र का काला दिन"। पाकिस्तान ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए भारत से राजनयिक संबंध कम कर दिए हैं, लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि यह हमारा आंतरिक मामला है। भविष्य ही बताएगा कि इस फैसले से कश्मीर में शांति आएगी या नहीं, लेकिन आज भारत का नक्शा हमेशा के लिए बदल गया है।
धारा 370 हटने के फैसले को आप किस नजरिए से देखते हैं? क्या यह कश्मीर की तरक्की का रास्ता खोलेगा? अपनी बेबाक राय कमेंट्स में लिखें।