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ह्यूमनॉइड रोबोट्स की दुनिया: क्या हम उस भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हमारे दोस्त और नौकर दोनों मशीनें होंगी?

नई दिल्ली, 16 जनवरी 2025: एलन मस्क की कंपनी Tesla ने एक वीडियो जारी किया जो देखकर रीढ़ में सिहरन होती है—और आँखें आश्चर्य से चौड़ी भी हो जाती हैं। उनके Optimus ह्यूमनॉइड रोबोट को Tesla की फैक्ट्री में काम करते दिखाया गया—पुर्जे उठाना, उन्हें सही जगह रखना, और यह सब किसी इंसानी दिशा-निर्देश के बिना। Boston Dynamics के 'Atlas' ने Parkour—यानी दीवारें फाँदना, उल्टा पलटना—कर दिखाया। और चीन? वह तो ह्यूमनॉइड रोबोट की फौज बना रहा है। सवाल यह है कि जब मशीनें इंसान जैसी दिखने और काम करने लगें, तो इंसान क्या करेगा?

ह्यूमनॉइड रोबोट भविष्य
फोटो साभार: Unsplash (Free to use)

ह्यूमनॉइड रोबोट क्यों—और क्यों अभी?

एक स्वाभाविक सवाल है—जब Industrial robots पहले से मौजूद हैं, तो इंसान जैसा रोबोट क्यों बनाया जाए? जवाब यह है कि दुनिया इंसानों के लिए बनी है—दरवाज़े, सीढ़ियाँ, टेबल-कुर्सियाँ, उपकरण—सब इंसानी शरीर के हिसाब से हैं। अगर रोबोट इंसान की जगह काम करना है, तो उसे इंसान जैसा ही होना होगा—दो पैर, दो हाथ, और इंसान जैसी समझ। इसके साथ AI की तरक्की ने यह संभव बना दिया कि रोबोट अब वातावरण को समझ सके, फैसले ले सके, और नई परिस्थितियों में ढल सके।

कहाँ इस्तेमाल होंगे ये रोबोट?

सबसे पहले, उन जगहों पर जहाँ काम खतरनाक है—परमाणु संयंत्र, खानें, युद्ध क्षेत्र। फिर, उन जगहों पर जहाँ श्रमिकों की कमी है—जापान और यूरोप जैसे देश जहाँ आबादी बूढ़ी हो रही है। बुज़ुर्गों की देखभाल, गोदाम और लॉजिस्टिक्स, निर्माण कार्य—ये सब क्षेत्र हैं जहाँ ह्यूमनॉइड रोबोट क्रांति ला सकते हैं। और भारत? भारत में जनसांख्यिकी अभी अनुकूल है, लेकिन 2040-2050 के बाद जब बुज़ुर्ग आबादी बढ़ेगी, तब यह तकनीक यहाँ भी ज़रूरी हो जाएगी।

रिश्तों में मशीनें: एक नई नैतिक पहेली

जापान में पहले से ही कुछ बुज़ुर्ग 'Pepper' जैसे रोबोट के साथ बातें करते हैं, उसे अपना दोस्त मानते हैं। कुछ लोगों ने AI 'साथी' (Companion AI) के साथ इमोशनल बॉन्ड बना लिया है। जब ह्यूमनॉइड रोबोट और ज़्यादा असली लगने लगेंगे, तो क्या इंसानी रिश्ते कमज़ोर नहीं पड़ेंगे? क्या एक इंसान जो अकेलापन महसूस करता है, रोबोट-दोस्त से संतुष्ट हो जाएगा और असली दोस्ती की कोशिश ही नहीं करेगा? ये सवाल तकनीकी नहीं, गहरे दार्शनिक हैं।

"हम एक ऐसा रोबोट बना रहे हैं जो एक दिन 10 डॉलर प्रति घंटे में सब कुछ कर सकेगा जो एक इंसान करता है। यह या तो मानवता का सबसे बड़ा वरदान होगा या सबसे बड़ा अभिशाप—यह हम पर निर्भर करता है।" — एलन मस्क, Tesla और X के सीईओ

भारत की तैयारी

भारत में ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स अभी शुरुआती अवस्था में है। IIT बॉम्बे, IIT दिल्ली और कुछ स्टार्टअप्स इस दिशा में काम कर रहे हैं। सरकार की 'Make in India' नीति के तहत रोबोटिक्स को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। लेकिन बड़ी चुनौती है—अगर ह्यूमनॉइड रोबोट भारत में मैन्युफैक्चरिंग में आ गए, तो उन करोड़ों मज़दूरों का क्या होगा जो असेंबली लाइन पर काम करते हैं?

निष्कर्ष: इंसानियत का असली इम्तिहान

ह्यूमनॉइड रोबोट्स की दुनिया आ रही है—यह अब 'अगर' नहीं, 'कब' का सवाल है। इस दुनिया में इंसान का मूल्य उसकी शारीरिक श्रमशक्ति से नहीं, उसकी मानवीयता से तय होगा—उसके प्रेम से, उसकी करुणा से, उसकी रचनात्मकता से। शायद यही वह मौका है जब इंसानियत को यह तय करना होगा कि वह वाकई 'इंसान' क्या है।

क्या आप चाहेंगे कि आपके घर में एक ह्यूमनॉइड रोबोट हो? या यह विचार आपको डराता है? कमेंट्स में अपनी राय दें।

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