नई दिल्ली, 22 सितंबर 2017: ट्विटर बंद, फेसबुक ब्लॉक, व्हाट्सएप डाउन—और सरकार का जवाब? "कानून-व्यवस्था के लिए यह ज़रूरी था।" जम्मू-कश्मीर में तो इंटरनेट शटडाउन अब एक आम बात हो गई है, लेकिन यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं है। चीन का 'ग्रेट फायरवॉल' तो दुनिया में सबसे मशहूर है, लेकिन रूस, तुर्की, ईरान, म्यांमार और यहाँ तक कि कई यूरोपीय देश भी सोशल मीडिया को लेकर सख्त होते जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब इंटरनेट को 'सूचना का महासागर' कहा जाता है, तो इस महासागर पर ताला क्यों लगाया जा रहा है?
चीन से भारत तक: इंटरनेट बंदी का भूगोल
Access Now नाम की संस्था हर साल 'Internet Shutdown' की रिपोर्ट प्रकाशित करती है। इनकी ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल दुनियाभर में 200 से ज़्यादा बार इंटरनेट बंद किया गया, और इसमें भारत सबसे आगे था। अकेले कश्मीर में एक साल में 50 से ज़्यादा इंटरनेट शटडाउन हुए। चीन में Google, Facebook, YouTube, WhatsApp—सब ब्लॉक हैं और वहाँ के लोग सरकारी 'WeChat' और 'Weibo' के साथ जीने को मजबूर हैं। रूस ने हाल ही में एक कानून बनाया है जिसके तहत वह पूरे देश का इंटरनेट बाकी दुनिया से काट सकता है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान ने 2016 के तख्तापलट की कोशिश के बाद सोशल मीडिया को "राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा" घोषित कर दिया।
सरकारें क्यों डरती हैं सोशल मीडिया से?
इसका जवाब 'अरब स्प्रिंग' में छिपा है। 2010-11 में जब ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया और सीरिया में जनक्रांतियाँ हुईं, तो उन्हें "Facebook Revolution" और "Twitter Revolution" का नाम दिया गया। सोशल मीडिया ने आम लोगों को एक ऐसा हथियार दे दिया जो सत्ता के लिए अप्रत्याशित और अनियंत्रित था। जब भी किसी देश में चुनाव होते हैं, कोई बड़ा आंदोलन उठता है, या सरकार की कोई नाकामी सामने आती है—उसी वक्त इंटरनेट काटा जाता है। यह एक सरल समीकरण है: जानकारी = शक्ति, और जो शक्ति पर नियंत्रण चाहता है, वह जानकारी को नियंत्रित करता है।
लोकतंत्र का दोहरा चेहरा
यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास है। जर्मनी जैसे देश ने फेसबुक पर 'हेट स्पीच' (Hate Speech) को लेकर सख्त कानून बनाए हैं और कंपनियों पर भारी जुर्माने लगाए हैं। फ्रांस ने 'फर्जी खबरों' (Fake News) पर कानून बनाया। ये सब लोकतांत्रिक देश हैं, लेकिन इनकी नीतियाँ और तानाशाही देशों की नीतियाँ कहीं-कहीं एक ही जगह जाकर मिलती हैं—यानी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश। सवाल यह है कि फर्क कहाँ है? शायद नीयत में—लेकिन नतीजे में तो एक जैसा ही असर होता है।
"इंटरनेट शटडाउन आधुनिक युग का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है—न गोली चलानी पड़ती है, न लाठी। बस एक आदेश, और लाखों लोग अंधेरे में।" — डिजिटल अधिकार कार्यकर्ता, नेहा मेहता
आम नागरिक की कीमत
जब इंटरनेट बंद होता है, तो सबसे ज़्यादा नुकसान किसे होता है? उन लोगों को जो Google Pay या UPI से अपना कारोबार चलाते हैं। उन छात्रों को जिनकी ऑनलाइन परीक्षा है। उन पत्रकारों को जिन्हें ख़बर भेजनी है। और उन परिवारों को जो अपने किसी बीमार रिश्तेदार की खबर लेना चाहते हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी उद्योग की एक रिपोर्ट बताती है कि एक दिन के इंटरनेट शटडाउन से देश को लगभग 70 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। तब भी सरकारें यही कहती हैं—"कानून-व्यवस्था के लिए यह ज़रूरी था।"
निष्कर्ष: नियंत्रण और आज़ादी के बीच की पतली लकीर
सोशल मीडिया के खतरे असली हैं—फेक न्यूज़, हेट स्पीच, चुनावी हेरफेर। लेकिन इन खतरों का जवाब इंटरनेट बंद करना नहीं है। यह ऐसा ही है जैसे किसी बीमारी के इलाज में पूरे मरीज़ को ही खत्म कर दिया जाए। जब भी कोई सरकार इंटरनेट बंद करती है, वह असल में यह स्वीकार करती है कि वह अपने नागरिकों से डरती है। और जो सरकार अपने नागरिकों से डरे, वह कैसी सरकार?
क्या आपको लगता है कि इंटरनेट बंदी कभी भी जायज़ हो सकती है? या यह हमेशा लोकतंत्र के खिलाफ है? अपनी राय कमेंट्स में बताएं।