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ग्रामीण भारत में 'नारी शक्ति' का उदय: घूंघट से निकलकर पंचायत और बिज़नेस तक, कैसे बदल रही है गाँव की महिलाओं की दुनिया?

भोपाल/पटना, 14 जून 2017: कुछ साल पहले तक राजस्थान के टोंक जिले के एक गाँव में सविता देवी के लिए "घर के बाहर जाना" भी एक बड़ी घटना हुआ करती थी। लेकिन आज वही सविता उस गाँव की सरपंच हैं, पंचायत की बैठकों में 30 मर्दों के बीच बैठकर गाँव के बजट पर फैसला करती हैं, और पिछले तीन साल में उन्होंने गाँव में एक आंगनवाड़ी, दो हैंडपंप और एक पक्की सड़क बनवाई है। सविता की यह कहानी अकेली नहीं है — यह उस बदलाव की कहानी है जो भारत के गाँवों में धीरे-धीरे, पर मज़बूती से आ रहा है।



फोटो साभार: Wikimedia Commons

33% आरक्षण से 50% तक का सफर

1992 में 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण दिया था। लेकिन उस वक्त ज़्यादातर महिला सरपंचों के नाम का इस्तेमाल करके असली काम उनके पति या ससुर करते थे — इसे "सरपंच पति" का ज़माना कहते थे। आज तस्वीर बदल रही है। बिहार, राजस्थान, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में आरक्षण बढ़ाकर 50% कर दिया गया है। और अब महिलाएं सिर्फ नाममात्र की सरपंच नहीं हैं — वो बैठकों में बोलती हैं, मनरेगा के पैसों का हिसाब माँगती हैं, और खुद प्रोजेक्ट प्रपोज़ करती हैं।

SHG का जादू — स्वयं सहायता समूह से बदल रही ज़िंदगियाँ

ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक आज़ादी की कहानी में Self Help Groups (SHG) का योगदान किसी क्रांति से कम नहीं। आज देश में 1.2 करोड़ से ज़्यादा SHG हैं जिनमें 14 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं जुड़ी हैं। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में एक SHG की महिलाओं ने मिलकर एक "महिला हाट" शुरू किया जहाँ वो अचार, पापड़, हस्तशिल्प और जैविक सब्ज़ियाँ बेचती हैं। इस हाट की मासिक बिक्री अब ₹5 लाख से ऊपर हो गई है। यह सिर्फ आर्थिक उपलब्धि नहीं है — यह उन महिलाओं का आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का प्रमाण है जो कभी घर की दहलीज़ से बाहर नहीं जाती थीं।

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने एक बार कहा था— "जब एक महिला आर्थिक रूप से सशक्त होती है, तो पूरा परिवार सशक्त होता है। और जब परिवार सशक्त होता है, तो राष्ट्र सशक्त होता है।" भारत के गाँवों में यह सूत्र अब ज़मीन पर उतर रहा है।

चुनौतियाँ अभी भी बाकी हैं

लेकिन यह सफर अभी लंबा है। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा, बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी बुराइयाँ अभी भी ग्रामीण भारत के कई कोनों में जड़ें जमाए बैठी हैं। शिक्षा का अभाव और मोबाइल-इंटरनेट की उपलब्धता न होना महिलाओं को डिजिटल अर्थव्यवस्था से काट देती है। पर जो बदलाव आ रहा है वो वास्तविक है, और उसे देखकर उम्मीद जगती है कि आने वाले दशकों में ग्रामीण भारत की महिला सिर्फ घर की नहीं, देश की अर्थव्यवस्था की भी धुरी बनेगी।

अपने आसपास किसी ऐसी महिला की प्रेरणादायक कहानी जानते हैं जिसने सभी बाधाओं को पार करके कुछ बड़ा हासिल किया? हमें बताइए और उनकी कहानी को आगे बढ़ाइए!

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