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आधी रात का 'भूचाल': 500 और 1000 के नोट रद्दी हुए! पीएम मोदी के एक ऐलान ने देश को लाइन में लगा दिया

घड़ी में रात के 8 बजे थे। लोग अपने-अपने घरों में डिनर की तैयारी कर रहे थे, तभी टीवी स्क्रीन्स पर एक ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश हुई—"प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं।" किसी को अंदाजा भी नहीं था कि अगले 30 मिनट में उनकी जेब में रखा पैसा महज 'कागज का टुकड़ा' बनकर रह जाएगा। 8 नवंबर 2016 की यह तारीख आजाद भारत के आर्थिक इतिहास की सबसे उथल-पुथल वाली रात बन गई है।



फोटो साभार: Wikimedia Commons

"मेरे प्यारे देशवासियों..." और सन्नाटा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में कहा— "आज रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपये के मौजूदा नोट कानूनी निविदा (Legal Tender) नहीं रहेंगे।" इसका मतलब था कि देश की 86% करेंसी (मुद्रा) एक झटके में बेकार हो गई। यह फैसला काले धन, जाली नोटों और आतंकवाद की फंडिंग पर एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' बताया गया, लेकिन इसका सीधा असर आम आदमी की रसोई और नींद पर पड़ा।

एटीएम के बाहर कयामत की रात

खबर फैलते ही पेट्रोल पंपों, ज्वेलरी शॉप्स और एटीएम के बाहर ऐसी भीड़ उमड़ी जैसी शायद ही कभी देखी गई हो। लोग अपने पास रखे 100-100 के नोटों को ऐसे सहेज रहे थे जैसे वो सोना हों। जिनके घरों में अगले हफ्ते शादियाँ थीं, उनके चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं। सोशल मीडिया पर अफवाहों और जोक्स (जैसे 'सोनम गुप्ता बेवफा है') की बाढ़ आ गई, लेकिन जमीन पर हकीकत बेहद तनावपूर्ण थी।

पीएम मोदी ने भावुक अपील करते हुए कहा, "मैंने देश के लिए अपना घर-बार छोड़ा है... मुझे सिर्फ 50 दिन दीजिए। अगर उसके बाद कोई कमी रह जाए, तो आप जिस चौराहे पर मुझे सजा देंगे, मैं तैयार हूँ।"

डिजिटल इंडिया का जबरन जन्म?

इस अफरातफरी के बीच एक नई क्रांति ने जन्म लिया—डिजिटल पेमेंट्स। पेटीएम (Paytm) और गूगल पे (Google Pay) जैसे एप्स, जो कल तक सिर्फ कुछ टेक-सेवी लोग इस्तेमाल करते थे, अचानक सब्जी वाले और चाय वाले की भी जरूरत बन गए। क्या यह फैसला काले धन को खत्म करने में सफल रहा, यह बहस का विषय है, लेकिन इसने भारत को 'कैशलेस' बनाने की दिशा में जबरदस्ती ही सही, मगर एक बड़ा धक्का जरूर दिया।

निष्कर्ष: एक कड़वी दवाई

बैंकों की कतारों में खड़े-खड़े कई लोगों ने अपनी जान गंवाई, तो कइयों का काला धन गंगा में बहता हुआ दिखा। यह फैसला साहसिक था या तुगलकी, इसका फैसला इतिहास करेगा। लेकिन एक बात तय है—उस रात कोई भी भारतीय चैन की नींद नहीं सो पाया था।

नोटबंदी के दौरान आपका अनुभव कैसा था? क्या आप भी घंटों लाइन में लगे थे? अपनी कहानी कमेंट्स में साझा करें।

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