नई दिल्ली/बर्लिन, 11 जुलाई 2016: सितंबर 2015 में तुर्की के एक समुद्र तट पर एक तीन साल के बच्चे की तस्वीर ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। उस बच्चे का नाम था अलान कुर्दी—एक सीरियाई बच्चा जो बेहतर जिंदगी की तलाश में अपने परिवार के साथ भूमध्य सागर पार करने की कोशिश में डूब गया। उस एक तस्वीर ने वह कर दिखाया जो हज़ारों रिपोर्ट्स और आँकड़े नहीं कर पाए—उसने दुनिया को जगा दिया। लेकिन कुछ हफ्ते बाद वह तस्वीर भी भुला दी गई, और शरणार्थियों का वह सैलाब जो 60 साल में सबसे बड़ा था, आज भी थमा नहीं है।
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आँकड़ों के पीछे छिपे इंसान
UNHCR (संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी) का कहना है कि आज दुनिया में 6.5 करोड़ से ज़्यादा लोग विस्थापित हैं। लेकिन ये सिर्फ संख्याएँ हैं। इनके पीछे हैं—वो माँ जो रात के अँधेरे में अपने बच्चे को छाती से चिपटाए किसी अनजान देश की सरहद पार कर रही है; वो डॉक्टर जो कभी दमिश्क के बड़े अस्पताल में काम करता था, और आज ग्रीस के किसी टेंट में रह रहा है; वो बुज़ुर्ग जो अपने पुश्तैनी घर की एक तस्वीर अपनी जेब में रखकर चला था और अब नहीं जानता कि वह घर अभी भी खड़ा है या नहीं। ये लोग शरणार्थी नहीं बनना चाहते थे—इन्हें बनाया गया।
सीरिया: एक देश का धीरे-धीरे मरना
2011 में सीरिया में शुरू हुआ 'अरब स्प्रिंग' का विरोध प्रदर्शन देखते-देखते एक ऐसे गृहयुद्ध में तब्दील हो गया जिसने एक पूरी सभ्यता को तहस-नहस कर दिया। अलेप्पो—जो कभी दुनिया के सबसे पुराने बसे हुए शहरों में से एक था—खंडहर बन गया। 5 साल के युद्ध में 4 लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और 1.1 करोड़ सीरियाई अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए। इनमें से आधे देश के बाहर गए—जॉर्डन, लेबनान, तुर्की, और फिर यूरोप की तरफ। यूरोप की उस 'बेस्ट इन क्लास' सुरक्षा व्यवस्था ने इन्हें 'खतरा' बताकर रोकने की कोशिश की।
यूरोप का दोहरा मापदंड
जब यूक्रेन से लोग भागे, तो यूरोप के देशों ने दरवाज़े खोल दिए। जब अफ्रीका और मध्य-पूर्व से लोग आए, तो कंटीले तार लगा दिए गए। क्या यह इत्तेफाक है या नीति? हंगरी ने सरहद पर दीवार खड़ी की, ऑस्ट्रिया ने प्रवेश पर रोक लगाई, और ब्रिटेन ने Brexit को आंशिक रूप से 'आव्रजन के डर' की वजह से किया। इस पूरे प्रकरण ने यूरोप के उस "मानवाधिकारों की भूमि" वाले दावे की पोल खोल दी।
"हम शरणार्थी नहीं हैं, हम इंसान हैं। हम अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं। हम भाग नहीं रहे—हम बचने की कोशिश कर रहे हैं।" — फातिमा अल-रशीद, सीरियाई शरणार्थी, जॉर्डन के ज़ातारी कैंप से
भारत और शरणार्थी: एक अलग कहानी
भारत ने कभी UNHCR की शरणार्थी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए, फिर भी इस देश ने तिब्बती, श्रीलंकाई तमिल, बांग्लादेशी और अब रोहिंग्या शरणार्थियों को आश्रय दिया है। लेकिन आज रोहिंग्याओं को "घुसपैठिये" कहकर वापस भेजने की माँग उठ रही है। यह बहस जटिल है—एक तरफ मानवीयता है, दूसरी तरफ संसाधनों की सीमा और सुरक्षा की चिंताएँ। लेकिन एक बात तय है: जब तक युद्ध, जलवायु परिवर्तन और तानाशाही रहेगी, शरणार्थी रहेंगे।
निष्कर्ष: क्या हम इंसान हैं?
शरणार्थी संकट दुनिया की सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा है। यह परीक्षा यह नहीं है कि हमारी सेनाएँ कितनी मज़बूत हैं या हमारी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी—यह परीक्षा है कि जब एक इंसान दूसरे इंसान के सामने मदद के लिए हाथ फैलाता है, तो वह हाथ पकड़ा जाता है या उसे धक्का दिया जाता है। आँकड़े भले ही थका दें, लेकिन हर आँकड़े के पीछे एक चेहरा है, एक नाम है, एक कहानी है—जो हेडलाइन्स में जगह नहीं बना पाती।
शरणार्थियों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी क्या है? क्या आपको लगता है कि भारत को एक सख्त शरणार्थी नीति की ज़रूरत है? अपनी बात कमेंट्स में कहें।