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ग्लोबल पावर गेम और भारत की जेब: महाशक्तियों के कूटनीतिक फैसलों का सीधा असर आपके सेविंग्स अकाउंट पर कैसे पड़ता है?

नई दिल्ली, 29 जून 2015: जब अमेरिका के Federal Reserve ने ब्याज दरें बढ़ाने का संकेत दिया, तो हज़ारों किलोमीटर दूर मुंबई के शेयर बाज़ार में भूचाल आ गया। जब अमेरिका-चीन के बीच trade war छिड़ा, तो भारत में smartphone की कीमतें बढ़ने लगीं। जब Middle East में तनाव बढ़ा, तो दिल्ली में पेट्रोल-डीज़ल के दाम उछल पड़े। यह सब coincidence नहीं है — यह उस वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का सच है जिसमें हर देश एक-दूसरे से इस कदर जुड़ा है कि वाशिंगटन की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आपके मुंबई के बैंक खाते को हिला सकती है।



फोटो साभार: Wikimedia Commons

Dollar की चाल और Rupee का हाल

भारतीय रुपये की कीमत सीधे तौर पर US Dollar से जुड़ी है। जब भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मज़बूत होती है और Fed दरें बढ़ाता है, तो global investors अपना पैसा US bonds में लगाते हैं और Emerging Markets जैसे भारत से पैसा निकाल लेते हैं। इससे रुपया कमज़ोर होता है। कमज़ोर रुपये का मतलब है — import महंगा, तेल महंगा, raw materials महंगे, और अंत में हर चीज़ महंगी। 2013 में "Taper Tantrum" के समय रुपया ₹68 के पार चला गया था — तब हर भारतीय परिवार ने यह महसूस किया था।

चीन की factory और भारत का बाज़ार

भारत चीन से हर साल ₹6-7 लाख करोड़ से ज़्यादा का सामान import करता है। Electronics, medicines (APIs), solar panels — बहुत कुछ चीन से आता है। जब अमेरिका ने चीन पर tariffs लगाए, तो चीनी कंपनियों ने अपना सामान dumping की तरह भारत में भेजना शुरू किया, जिससे भारतीय उत्पादक तबाह हुए। और जब COVID के दौरान चीनी supply chain बंद हुई, तो भारत की pharmaceutical और electronics industry को भी झटका लगा। यही है वो खतरा जिसे "supply chain dependency" कहते हैं।

पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन का मानना है— "भारत को एक ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी जो global shocks को absorb कर सके। इसके लिए strong domestic demand, diversified exports, और fiscal prudence — तीनों ज़रूरी हैं।"

भारत की बढ़ती ताकत

हालांकि आशावाद की भी वजहें हैं। $4 trillion की तरफ बढ़ती GDP, "China Plus One" strategy में भारत को मिलता फायदा, और G20 की presidency में मिली diplomatic मज़बूती — ये सब बताते हैं कि भारत धीरे-धीरे एक price-taker से price-influencer बन रहा है। लेकिन यह सफर लंबा है, और तब तक हर भारतीय नागरिक को यह समझना होगा कि उनकी जेब का कनेक्शन White House और Kremlin तक जाता है।

क्या आपको लगता है भारत को आर्थिक रूप से ज़्यादा आत्मनिर्भर होना चाहिए? या globalization के साथ चलना ही एकमात्र रास्ता है? अपनी राय साझा करें।

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