नई दिल्ली, 18 मार्च 2014: उत्तराखंड में पिछले साल आई बाढ़ की तबाही अभी लोगों के जेहन से गई नहीं थी कि इस साल फिर से बेमौसम बारिश ने कोहराम मचाना शुरू कर दिया। राजस्थान में जनवरी में ओले गिरे, केरल में मई की जगह मार्च में मानसून दस्तक दे गया, और हिमाचल के ग्लेशियर वैज्ञानिकों की आँखों के सामने तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं। ये कोई इत्तेफाक नहीं है—यह धरती का बुखार है, जिसे हम जलवायु परिवर्तन (Climate Change) कहते हैं। और सबसे डरावनी बात यह है कि इन सबकी चेतावनियाँ दशकों पहले से दी जा रही हैं, लेकिन हम सुनने को तैयार नहीं हैं।
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हिमालय के आँसू: ग्लेशियर पिघलने की खतरनाक रफ्तार
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालय के लगभग 75% ग्लेशियर पिछले 50 वर्षों में सिकुड़ चुके हैं। गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा नदी का उद्गम स्थल है, हर साल 22 मीटर की दर से पीछे हट रहा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर यही रफ्तार जारी रही, तो 2050 तक भारत के कई छोटे ग्लेशियर पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे। और जब ग्लेशियर नहीं रहेंगे, तो गर्मियों में गंगा-यमुना जैसी नदियों में पानी कहाँ से आएगा? ये सवाल सिर्फ पर्यावरणविदों का नहीं, उन 50 करोड़ लोगों का है जो इन नदियों के पानी पर निर्भर हैं।
बेमौसम बारिश और 'नए मौसम' का कहर
जो किसान 30-40 साल से खेती कर रहे हैं, वे भी अब कहते हैं कि "मौसम का कोई भरोसा नहीं रहा।" मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के किसान रामप्रसाद यादव बताते हैं, "पहले मार्च आते ही गेहूँ पक जाता था, अब अप्रैल में भी आसमान से आग बरसती है। फसल जल जाती है।" इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि दक्षिण एशिया में मानसून पैटर्न पूरी तरह बदल जाएगा—कहीं सूखा, कहीं बाढ़, और सब कुछ अप्रत्याशित। यानी खेती की पुरानी समझ बेकार हो जाएगी और करोड़ों किसानों की रोज़ी-रोटी दाँव पर लग जाएगी।
समुद्र का बढ़ता गुस्सा: तटीय शहरों पर मंडराता खतरा
मुंबई, चेन्नई, कोलकाता—ये तीन महानगर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। लेकिन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी की स्टडी कहती है कि समुद्र का जलस्तर हर साल 3 मिलीमीटर बढ़ रहा है। यह आँकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन आने वाले 50 साल में यह मुंबई के कई निचले इलाकों, सुंदरबन के गाँवों और लक्षद्वीप के द्वीपों को पूरी तरह डुबो सकता है। बांग्लादेश में पहले ही "जलवायु शरणार्थियों" की संख्या लाखों में पहुँच चुकी है। क्या हम भी उसी राह पर हैं?
जाने-माने जलवायु वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र पचौरी, जो IPCC के अध्यक्ष रह चुके हैं, कहते हैं— "जलवायु परिवर्तन कोई भविष्य की समस्या नहीं है, यह आज, अभी, इसी पल हो रहा है। अगर अगले 10 साल में हमने दिशा नहीं बदली, तो अगली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।"
हम क्या कर सकते हैं? सरकार से लेकर आम नागरिक तक
समाधान असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए इच्छाशक्ति चाहिए। सौर ऊर्जा में भारत की क्षमता दुनिया में सबसे ज़्यादा है—अगर हर घर की छत पर सोलर पैनल लग जाए तो? इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने से शहरों में वायु प्रदूषण एक झटके में आधा हो सकता है। और वृक्षारोपण? वह तो सबसे सस्ता और सबसे कारगर हथियार है। लेकिन इन सबके लिए ज़रूरी है कि हम जलवायु परिवर्तन को राजनीतिक मुद्दा बनाना बंद करें और इसे एक अस्तित्व की लड़ाई की तरह लें। धरती के पास कोई नेता नहीं है—उसका एकमात्र नागरिक हम हैं।
निष्कर्ष: विनाश की तारीख या जागरण की घड़ी?
इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि एक प्रजाति को पता है कि वह खुद अपनी तबाही लिख रही है—और फिर भी वह रुक नहीं रही। जलवायु परिवर्तन न तो पश्चिम की समस्या है, न पूर्व की। यह उस एकमात्र घर की समस्या है जो हम सबके पास है—पृथ्वी। और इस घर को बचाने की ज़िम्मेदारी किसी एक देश की नहीं, हम सबकी है। सवाल यह नहीं कि तबाही आएगी या नहीं—सवाल यह है कि हम उसे रोकने के लिए क्या कर रहे हैं।
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