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आधुनिक भारत में शादियों का बदलता स्वरूप: भव्य समारोहों के बीच लिव-इन और कोर्ट मैरिज की तरफ क्यों भाग रहा है आज का युवा?

मुंबई/दिल्ली, 5 दिसंबर 2013: एक तरफ है वो भव्य बारात जिसमें 200 गाड़ियों का काफिला है, हेलीकॉप्टर से दूल्हे का आगमन है, और लेडी गागा के गाने पर नाचती भीड़ है। दूसरी तरफ है वो सुबह का एक शांत दृश्य — एक रजिस्ट्रार ऑफिस में दो युवा, दो गवाह, और एक सादी सी दस्तखत — और शादी हो गई। भारत इन दोनों extremes के बीच झूल रहा है। लेकिन पिछले एक दशक में एक तीसरा रास्ता भी उभर रहा है — लिव-इन रिलेशनशिप — जिसे अब Supreme Court भी मान्यता दे चुकी है, भले ही समाज अभी इसे पूरी तरह स्वीकार न कर पाए।



फोटो साभार: Wikimedia Commons

शादी में करोड़ों, तलाक़ में भी करोड़ों

KPMG की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय शादी उद्योग (Wedding Industry) का बाज़ार लगभग ₹4.25 लाख करोड़ का है — जो देश की GDP का एक बड़ा हिस्सा है। औसत भारतीय शादी पर ₹20-25 लाख खर्च होते हैं, और "destination weddings" में तो यह ₹1 करोड़ से ऊपर चला जाता है। लेकिन जिस देश में इतनी धूमधाम से शादियाँ होती हों, वहाँ divorce rate भी तेज़ी से बढ़ रहा है — पिछले दशक में यह दोगुना हो चुका है। शहरों में खासकर यह trend ज़्यादा है। मुंबई और दिल्ली के family courts में divorce cases की लंबी कतारें इस बात की गवाह हैं।

युवाओं की सोच — "पहले खुद को जानो, फिर शादी करो"

25 साल की अनन्या मुंबई में एक media company में काम करती है और अपने boyfriend के साथ लिव-इन में रहती है। वो कहती है, "मैं शादी के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन पहले यह जानना चाहती हूँ कि हम साथ रह सकते हैं या नहीं। मेरे माँ-बाप ने बिना एक-दूसरे को जाने शादी की — आज भी साथ हैं, लेकिन खुश हैं या नहीं, मुझे पता नहीं।" यह सोच तेज़ी से फैल रही है। लेकिन यह सोच अभी भी मुख्यतः शहरी, पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से स्वतंत्र युवाओं तक सीमित है।

समाजशास्त्री प्रो. शिव विश्वनाथन कहते हैं— "भारत में शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं है, यह दो परिवारों, दो जातियों और दो आर्थिक इकाइयों का विलय है। जब तक यह सोच नहीं बदलती, शादी में वो दबाव बना रहेगा जो कई बार इसे तोड़ देता है।"

कोर्ट मैरिज — सादगी या विद्रोह?

हर साल कोर्ट मैरिज की संख्या बढ़ रही है। कुछ लोगों के लिए यह खर्च बचाने का तरीका है, कुछ के लिए यह जाति-धर्म की बाधाओं को तोड़ने का रास्ता है, और कुछ के लिए यह एक सरल, बिना नाटक के जीवन की शुरुआत का तरीका। लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी इसे "बेशर्मी" की निशानी मानता है। यह द्वंद्व ही आज के भारत का असली portrait है — परंपरा और आधुनिकता के बीच फँसा एक देश जो तय नहीं कर पा रहा कि वो किसका बेटा है।

शादी के बदलते स्वरूप पर आपकी क्या राय है? क्या लिव-इन और कोर्ट मैरिज को समाज में स्वीकृति मिलनी चाहिए? अपने विचार कमेंट में साझा करें।

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