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तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा? दुनिया भर में सूखती नदियाँ और गिरता जल स्तर दे रहे हैं आने वाले सबसे बड़े संकट की दस्तक

नई दिल्ली, 30 अगस्त 2011: पूर्व उप-राष्ट्रपति और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता अल गोर ने एक दशक पहले कहा था कि "तेल के लिए युद्ध तो हम देख ही रहे हैं, लेकिन पानी के लिए युद्ध देखना अभी बाकी है।" उस वक्त बहुत से लोगों ने इसे अतिशयोक्ति समझकर नज़रअंदाज़ किया था। लेकिन आज भारत में सुप्रीम कोर्ट में कावेरी जल विवाद, राजस्थान में 30 किलोमीटर दूर से पानी लाती महिलाएँ, और बुंदेलखंड में पानी के लिए मारपीट की खबरें देखकर लगता है—शायद वह भविष्यवाणी उतनी गलत नहीं थी।



फोटो साभार: Unsplash (Free to use)

भारत की नदियाँ: एक मौन त्रासदी

एक ज़माना था जब गंगा, यमुना, गोदावरी और कावेरी—ये नदियाँ सिर्फ जल स्रोत नहीं थीं, ये भारत की सभ्यता की नींव थीं। आज गंगा का 40% से ज़्यादा हिस्सा प्रदूषण की वजह से "जैविक रूप से मृत" घोषित किया जा चुका है। यमुना का दिल्ली से गुज़रने वाला हिस्सा तो नाले से भी बदतर है। दक्षिण भारत की जीवनरेखा कहलाने वाली कावेरी अब गर्मियों में सूख जाती है और उसका पानी कर्नाटक-तमिलनाडु के बीच हर साल नई कड़वाहट भरती है। Central Water Commission का डेटा बताता है कि देश के 91 प्रमुख जलाशयों में से अधिकांश में पानी का स्तर 'खतरे के निशान' से नीचे है।

भूजल का खत्म होता खज़ाना

ज़मीन के नीचे का पानी—जिसे भूजल (Groundwater) कहते हैं—वह अंतिम आरक्षित भंडार है जिस पर भारत का 60% कृषि क्षेत्र और 85% पेयजल निर्भर है। लेकिन नासा (NASA) के GRACE उपग्रहों के डेटा ने 2013 में चौंकाने वाला खुलासा किया—उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश का हिस्सा) में भूजल इतनी तेज़ी से घट रहा है जितनी रफ्तार दुनिया में कहीं नहीं देखी गई। हरित क्रांति की ज़मीन—पंजाब—जहाँ से भारत का पेट भरता है, वहाँ के किसान अब 1,500 फीट तक नलकूप खोद रहे हैं क्योंकि 500 फीट पर पानी मिलना बंद हो गया है।

वैश्विक तस्वीर: जहाँ पानी है वहाँ ताकत है

नील नदी के पानी को लेकर इथियोपिया और मिस्र के बीच जो तनाव है, वह किसी भी दिन युद्ध में बदल सकता है। इथियोपिया ने नील पर 'ग्रैंड रेनेसाँ डैम' बनाया है जो मिस्र के जल हिस्से को 30% कम कर देगा। मिस्र ने 'युद्ध के सभी विकल्प खुले हैं' वाला बयान दिया है। पाकिस्तान और भारत के बीच सिंधु जल संधि कई बार तनाव की वजह बन चुकी है। मध्य एशिया में अरल सागर पूरी तरह सूख चुका है—यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी पर्यावरणीय तबाहियों में से एक है।

"पानी 21वीं सदी का नया तेल है। फर्क सिर्फ यह है कि तेल के बिना गाड़ी रुकती है, पानी के बिना ज़िंदगी।" — वैश्विक जल नीति विशेषज्ञ, डॉ. अनुपम मिश्र

समाधान: क्या हम सुनेंगे?

जल संकट का समाधान तकनीकी भी है और सामाजिक भी। इजरायल दुनिया में सबसे कम पानी बर्बाद करने वाले देशों में है—वहाँ 'Drip Irrigation' और 'Desalination' तकनीक ने रेगिस्तान में खेती संभव कर दी है। भारत में अन्ना हज़ारे के रालेगण सिद्धी और राजेंद्र सिंह की 'जल क्रांति' ने यह साबित किया है कि परंपरागत जल संरक्षण के तरीके आज भी कारगर हैं। ज़रूरत है इच्छाशक्ति की—सरकारी और व्यक्तिगत, दोनों स्तर पर।

निष्कर्ष: कल की नहीं, आज की लड़ाई

तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा या नहीं, यह कहना मुश्किल है। लेकिन यह तय है कि जल संकट आने वाले दशकों में दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दा बनेगा। और यह संकट किसी 'कल' का नहीं—यह 'आज' का है। जब आप नल खोलते हैं तो पानी आता है—इस इत्मीनान को सहेजकर रखिए, क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ शायद इतनी खुशकिस्मत न हों।

आपके शहर में पानी की स्थिति कैसी है? क्या आप जल संरक्षण के लिए कोई प्रयास करते हैं? अपने अनुभव और सुझाव कमेंट्स में साझा करें।

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