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आर्थिक प्रतिबंधों का असली शिकार कौन: तानाशाह सरकारें तो बच जाती हैं, लेकिन आम जनता को दाने-दाने के लिए क्यों तरसना पड़ता है?

नई दिल्ली, 14 जून 2008: साल 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया, तो उससे पहले एक दशक से ज़्यादा समय तक वहाँ आर्थिक प्रतिबंध (Economic Sanctions) लागू थे। उन प्रतिबंधों का नतीजा क्या निकला? यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक उस दौरान इराक में 5 लाख से ज़्यादा बच्चे कुपोषण और दवाइयों की कमी से मर गए। और सद्दाम हुसैन? वह अपने महलों में रहा, तेल की 'ऑयल-फॉर-फूड' स्कीम से पैसे चुराता रहा, और आखिरी दम तक सत्ता में बना रहा। यह एक कड़वी सच्चाई है जिसे दुनिया बार-बार भूल जाती है—आर्थिक प्रतिबंध तानाशाहों को नहीं, आम नागरिकों को तोड़ते हैं।

आर्थिक प्रतिबंध जनता गरीबी
फोटो साभार: Unsplash (Free to use)

प्रतिबंध कैसे काम करते हैं—और कैसे नहीं करते

सिद्धांत में आर्थिक प्रतिबंध बहुत सुंदर लगते हैं। आप किसी देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव डालते हैं, उसकी सरकार को झुकने पर मजबूर करते हैं, और बिना एक भी गोली चलाए अपना मकसद हासिल कर लेते हैं। लेकिन व्यवहार में? क्यूबा पर अमेरिका के प्रतिबंध 60 साल से ज़्यादा से लागू हैं—फिदेल कास्त्रो चले गए, क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार आज भी है। ईरान पर दशकों के प्रतिबंध के बाद भी वहाँ की नीतियाँ नहीं बदलीं। उत्तर कोरिया दुनिया का सबसे ज़्यादा प्रतिबंधित देश है—किम जोंग उन रॉकेट टेस्ट करते रहते हैं, जनता भूख से मरती रहती है।

वेनेज़ुएला: एक संपन्न देश की तबाही की कहानी

दक्षिण अमेरिका का वेनेज़ुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाला देश है। लेकिन आज वहाँ लोग खाने के लिए कूड़ेदान खंगाल रहे हैं। हाइपरइन्फ्लेशन इतनी भयानक है कि एक रोटी की कीमत हर हफ्ते दोगुनी हो जाती है। 40 लाख से ज़्यादा वेनेज़ुएलन देश छोड़कर भाग चुके हैं। इसमें अमेरिकी प्रतिबंधों का हाथ है—और मादुरो सरकार की अक्षमता और भ्रष्टाचार का भी। लेकिन जो लोग तड़प रहे हैं, वे मादुरो के समर्थक नहीं थे—वे आम डॉक्टर, शिक्षक, किसान थे।

रूस-यूक्रेन युद्ध और प्रतिबंधों की 'नई पीढ़ी'

2022 में रूस पर जो प्रतिबंध लगाए गए, वे इतिहास में अब तक के सबसे बड़े और सबसे तेज़ प्रतिबंध थे। SWIFT से निकाला गया, विदेशी संपत्तियाँ फ्रीज़ की गईं, तकनीकी निर्यात रोका गया। नतीजा? रूसी रूबल एक बार 100 रुपये से नीचे आया, फिर वापस चला गया। रूसी अर्थव्यवस्था को झटका तो लगा, लेकिन पुतिन की सत्ता को नहीं। जो सबसे ज़्यादा पीड़ित हुए, वे थे मध्यमवर्गीय रूसी जिन्होंने IKEA, McDonald's और Netflix खो दिए। और दूसरी तरफ—यूरोप को भी ऊर्जा संकट झेलना पड़ा जिसने आम यूरोपीय नागरिकों के बिजली बिल आसमान पर पहुँचा दिए।

"प्रतिबंध एक ऐसा हथियार है जो चाहे जिस देश के खिलाफ चलाओ, घाव उस देश के आम नागरिक को होता है। शासक तो हमेशा किसी न किसी रास्ते से बच निकलते हैं।" — संयुक्त राष्ट्र के पूर्व विशेष दूत, अल्फ्रेडो डी ज़ायस

भारत की चालाक विदेश नीति

इस पूरे समीकरण में भारत की भूमिका दिलचस्प है। भारत ने रूस पर लगे प्रतिबंधों में शामिल होने से इनकार कर दिया और सस्ते रूसी तेल खरीदता रहा। अमेरिका ने दबाव बनाया, लेकिन भारत अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' पर अड़ा रहा। इसका नतीजा? भारत को सस्ती ऊर्जा मिली, और उसने यह भी साबित किया कि प्रतिबंधों की व्यवस्था तभी काम करती है जब पूरी दुनिया साथ हो—और पूरी दुनिया कभी साथ नहीं होती।

निष्कर्ष: नैतिकता और व्यावहारिकता के बीच

आर्थिक प्रतिबंध एक नैतिक पहेली हैं। एक तरफ यह तर्क है कि तानाशाहों को जवाबदेह बनाना ज़रूरी है। दूसरी तरफ यह हकीकत है कि जवाबदेह वे नहीं बनते, दंडित वह जनता होती है जो पहले से ही उस तानाशाह की शिकार है। शायद इसीलिए दुनिया के सबसे प्रभावी प्रतिबंध वे नहीं थे जो पूरी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करते हैं, बल्कि वे थे जो सीधे शासक और उसके निकटतम साथियों को निशाना बनाते हैं—उनकी विदेशी संपत्तियाँ, उनके बच्चों की विदेशी पढ़ाई, उनकी लग्जरी जिंदगी।

क्या भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर सही किया? या यह नैतिक रूप से गलत था? अपनी राय कमेंट्स में दें।

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