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भाषा का झगड़ा या राजनीति का खेल: हिंदी बनाम क्षेत्रीय भाषाओं के विवाद में क्या कहीं खो रही है देश की सांस्कृतिक एकता?

चेन्नई/बेंगलुरु, 17 नवंबर 2009: जब भी केंद्र सरकार "हिंदी के प्रचार-प्रसार" की बात करती है, दक्षिण भारत में विरोध की लहर दौड़ जाती है। तमिलनाडु में काले झंडे निकलते हैं, कर्नाटक में "कन्नड़ रक्षण वेदिके" सड़कों पर उतर आती है, और महाराष्ट्र में मराठी मानुस की भावनाएं भड़क उठती हैं। लेकिन एक सवाल हमेशा अनुत्तरित रहता है — क्या यह सच में भाषा की लड़ाई है, या यह राजनीति का एक ऐसा पुराना हथियार है जिसे हर चुनाव से पहले धारदार किया जाता है? और इस पूरे झगड़े में क्या हम भूल रहे हैं कि भारत की असली ताकत उसकी "विविधता में एकता" है?



फोटो साभार: Wikimedia Commons

संविधान ने क्या कहा और राजनीति ने क्या किया

भारत के संविधान ने हिंदी को "राजभाषा" (Official Language) का दर्जा दिया, लेकिन इसे "राष्ट्रभाषा" (National Language) कभी नहीं कहा गया। फिर भी हिंदी को थोपने की कोशिश हर कुछ सालों में होती है। 1965 में जब हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने की कोशिश हुई, तो तमिलनाडु में इतना भयंकर आंदोलन हुआ कि केंद्र को झुकना पड़ा और अंग्रेज़ी को सह-राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। इतिहास की यह lesson आज भी भुलाई नहीं गई है। दक्षिण के राज्यों को डर है कि यदि हिंदी अनिवार्य हुई तो UPSC, केंद्रीय नौकरियों और राष्ट्रीय मंच पर उनके बच्चे पिछड़ जाएंगे।

भाषा मरती है तो संस्कृति मरती है

UNESCO के अनुसार भारत की 197 से ज़्यादा भाषाएं और बोलियाँ खतरे में हैं। हर दो हफ्ते में दुनिया से एक भाषा गायब हो जाती है। जब एक भाषा मरती है, तो उसके साथ उस समुदाय का साहित्य, लोकगीत, परंपराएं और एक खास तरीके से दुनिया को देखने का नज़रिया भी मर जाता है। इसलिए क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण सिर्फ भावनात्मक मसला नहीं, यह सांस्कृतिक जैव-विविधता (Cultural Biodiversity) की रक्षा का मसला है।

साहित्यकार और भाषाविद् डॉ. गणेश देवी कहते हैं— "कोई भाषा बड़ी या छोटी नहीं होती। हिंदी को भारत की सभी भाषाओं की बड़ी बहन होना चाहिए, उनकी दुश्मन नहीं। जब हम भाषा के नाम पर लड़ते हैं, तो हम उस भारत को कमज़ोर करते हैं जिसे बाबासाहेब आंबेडकर ने बड़ी मेहनत से एक सूत्र में पिरोया था।"

रास्ता क्या है?

समाधान शायद "त्रि-भाषा फॉर्मूले" में है — मातृभाषा, हिंदी और अंग्रेज़ी — जिसे NEP 2020 ने भी दोहराया है। लेकिन इस फॉर्मूले को सभी राज्यों पर बल से नहीं, समझ से लागू करना होगा। और सबसे ज़रूरी है राजनेताओं का यह संकल्प कि वो भाषा को वोट बैंक की राजनीति का हथियार नहीं बनाएंगे। भारत की ताकत उसकी 22 संविधान-मान्य भाषाओं में है, उनमें से किसी एक को दूसरे पर थोपने में नहीं।

भाषा के इस विवाद पर आप क्या सोचते हैं? क्या हिंदी को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए या सभी भाषाओं को समान दर्जा मिलना चाहिए? कमेंट में बेबाक राय रखें।

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