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भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर महाकुंभ: अरबों का निवेश और एक्सप्रेसवे का जाल, लेकिन क्या आम आदमी को मिल रहा है असली फायदा?

नई दिल्ली, 18 जुलाई 2023: पिछले कुछ सालों में जब भी आप किसी हाईवे पर निकले होंगे, तो एक बात जरूर नोटिस की होगी — चारों तरफ जेसीबी मशीनों का शोर, उड़ती धूल, और बड़े-बड़े होर्डिंग जिन पर लिखा होता है "भारतमाला परियोजना", "अमृत काल में विकास की नई उड़ान।" केंद्र सरकार ने पिछले दशक में इंफ्रास्ट्रक्चर पर ₹111 लाख करोड़ से ज़्यादा खर्च करने का लक्ष्य रखा है और सच में, देश का नक्शा बदल रहा है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुलेट ट्रेन का काम, 100 से ज़्यादा नए एयरपोर्ट — यह सब देखकर दिल गर्व से भर जाता है। लेकिन सवाल यह है कि इस चमचमाती सड़क पर चलने वाला आम भारतीय कहाँ खड़ा है?



फोटो साभार: Wikimedia Commons

एक्सप्रेसवे पर दौड़ती गाड़ियाँ, गाँव की टूटी सड़कें

दिल्ली से लखनऊ अब सिर्फ 3.5 घंटे में पहुंचा जा सकता है — यह सच है और यह उपलब्धि भी है। लेकिन जब हम उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किसान रामकिशोर से बात करते हैं, तो वो कहते हैं, "साहब, हमारे गाँव की सड़क पर बरसात में घुटने भर पानी भर जाता है। एक्सप्रेसवे तो बड़े शहरों को जोड़ रहा है, हमारे खेत से मंडी तक कैसे पहुंचें, यह बताओ।" यही भारत की विकास की असली विडंबना है — टॉप-डाउन इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहे हैं, लेकिन लास्ट माइल कनेक्टिविटी आज भी सपना है। देश के 6 लाख गाँवों में से अभी भी लाखों गाँव ऐसे हैं जहाँ पक्की सड़क नहीं है।

टोल का बोझ और ठेकेदारों की चांदी

एक्सप्रेसवे बना तो, लेकिन उस पर चलने के लिए टोल टैक्स भी देना होगा। दिल्ली से जयपुर जाने वाले ड्राइवर आपको बताएंगे कि रास्ते में कई टोल बूथ आते हैं और हर बार ₹100-200 की चपत लगती है। ट्रांसपोर्ट कंपनियाँ यह लागत सामान की कीमतों में जोड़ती हैं, और अंत में यह बोझ आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है। इसके अलावा, जमीन अधिग्रहण की कहानियाँ भी कम दर्दनाक नहीं हैं — किसानों को औने-पौने दाम में ज़मीन देनी पड़ी है, और मुआवज़े के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार कहते हैं— "इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश तब सार्थक होता है जब उससे रोज़गार बढ़े, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो। अगर यही पैसा विदेशी कंपनियों को ठेका देने में चला जाए और स्थानीय मज़दूर को केवल दिहाड़ी मिले, तो विकास किसका हुआ?"

उम्मीद है, लेकिन शर्तें हैं

देश में इंफ्रास्ट्रक्चर का बढ़ना एक सकारात्मक संकेत है, इससे इनकार नहीं। पर असली सवाल यह है कि क्या इस विकास में हर तबके की हिस्सेदारी है? क्या गाँव की पगडंडी भी कभी एक्सप्रेसवे से जुड़ेगी? क्या किसान की उपज भी उसी रफ्तार से बाज़ार तक पहुंचेगी जिस रफ्तार से कॉर्पोरेट माल ढोया जाता है? यही सवाल भारत के विकास की असली कसौटी है।

आपके इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर क्या बदला है? क्या आपको लगता है यह विकास आम आदमी तक पहुंच रहा है? कमेंट में ज़रूर बताएं।

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