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बर्फ के नीचे छिपे खजाने की जंग: आर्कटिक क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के लिए अमेरिका, रूस और चीन के बीच क्यों मची है अंधी होड़?

नई दिल्ली, 4 मई 2023: उत्तरी ध्रुव के आसपास का वह बर्फीला इलाका जिसे कभी "दुनिया की छत" कहा जाता था, आज एक नए 'ग्रेट गेम' का मैदान बन चुका है। रूस ने आर्कटिक में अपनी सैन्य उपस्थिति पिछले एक दशक में दोगुनी कर ली है। अमेरिका ने अलास्का में नए सैन्य अड्डे बनाए हैं। और चीन—जिसकी आर्कटिक से कोई भौगोलिक सीमा ही नहीं है—उसने खुद को 'नियर-आर्कटिक स्टेट' घोषित कर दिया है और वहाँ अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। यह सब इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि इन देशों को बर्फ से प्यार हो गया है—यह हो रहा है क्योंकि जलवायु परिवर्तन ने उस बर्फ के नीचे छिपे खजाने का रास्ता खोल दिया है।



फोटो साभार: Unsplash (Free to use)

खजाना कितना बड़ा है?

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, आर्कटिक में दुनिया के अनदेखे तेल और गैस भंडार का लगभग 22% हिस्सा दफन है। यानी करीब 90 अरब बैरल तेल और 47 खरब क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस। इसके अलावा यहाँ निकल, तांबा, हीरा, सोना और दुर्लभ खनिज (Rare Earth Minerals) के विशाल भंडार हैं जिन पर दुनिया की तकनीकी अर्थव्यवस्था निर्भर है। पहले यह सब बर्फ के नीचे दबा था और निकालना असंभव था। लेकिन जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे यह खजाना पहुँच के दायरे में आता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन का यह वह पहलू है जिसके बारे में बड़ी ताकतें बात नहीं करना चाहतीं।

रूस की आक्रामक दावेदारी

2007 में रूस ने जो किया वह दुनिया को चौंका गया—उसने एक पनडुब्बी से उत्तरी ध्रुव की समुद्री तलहटी में रूसी झंडा गाड़ दिया! यह प्रतीकात्मक था, लेकिन संदेश बिल्कुल स्पष्ट था। रूस का दावा है कि आर्कटिक महासागर का एक बड़ा हिस्सा उसकी महाद्वीपीय शेल्फ का विस्तार है। उसने 'Northern Sea Route' को विकसित किया है जो यूरोप-एशिया के बीच की दूरी 40% कम कर देता है। और उसने 'Arctic Trefoil' जैसे अत्याधुनिक सैन्य अड्डे बनाए हैं जो परमाणु-सुरक्षित हैं।

चीन की चालाक रणनीति

चीन आर्कटिक का देश नहीं है, लेकिन वह वहाँ 'Polar Silk Road' का सपना देख रहा है। उसने नॉर्वे, ग्रीनलैंड और आइसलैंड में भारी निवेश किया है। उसके 'Snow Dragon' जैसे आइसब्रेकर जहाज़ आर्कटिक के रूट्स मैप कर रहे हैं। और वह आर्कटिक काउंसिल में 'ऑब्जर्वर' के रूप में धीरे-धीरे अपनी आवाज़ बढ़ा रहा है। यह चीनी 'शांतिपूर्ण उदय' की रणनीति का क्लासिक उदाहरण है—पहले व्यापार, फिर निवेश, फिर प्रभाव।

"आर्कटिक अगले 20 वर्षों में दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण भूराजनीतिक क्षेत्र बन जाएगा। जो इसे नियंत्रित करेगा, वह 21वीं सदी के व्यापार मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति दोनों को नियंत्रित करेगा।" — अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ, प्रो. हरीश कपूर

भारत के लिए क्या अर्थ है?

भारत भले ही आर्कटिक से हज़ारों मील दूर है, लेकिन यह मामला उसे सीधे प्रभावित करता है। अगर आर्कटिक में तेल-गैस निकासी बढ़ती है, तो वैश्विक ऊर्जा की कीमतें प्रभावित होंगी। अगर Northern Sea Route एक प्रमुख व्यापार मार्ग बन जाता है, तो पारंपरिक 'Spice Route' जिस पर भारत निर्भर है, वह कमज़ोर पड़ सकता है। भारत ने नॉर्वे में Svalbard archipelago में अपना एक रिसर्च स्टेशन 'Himadri' बनाया है—यह एक छोटा लेकिन समझदारी भरा कदम है।

निष्कर्ष: विकास या विनाश?

आर्कटिक की कहानी एक गहरी विडंबना है। जलवायु परिवर्तन—जो इंसान की गलतियों का नतीजा है—उस बर्फ को पिघला रहा है जो वहाँ के पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ है। और उसी पिघलती बर्फ से जो रास्ते खुल रहे हैं, उन पर महाशक्तियाँ दौड़ पड़ी हैं ताकि और तेल निकालें, जो और ज़्यादा जलवायु परिवर्तन करेगा। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें जीत किसी की नहीं—हार सबकी है।

क्या महाशक्तियों की आर्कटिक होड़ एक नई शीत युद्ध की शुरुआत है? क्या भारत को इसमें और सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए? कमेंट्स में बताएं।

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