नई दिल्ली, 15 नवंबर 2022: साल 2020 में जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy - NEP) का ऐलान किया था, तब पूरे देश में एक उम्मीद की लहर दौड़ गई थी। 34 साल बाद आई यह नीति वादे लेकर आई थी—रटने की पुरानी परंपरा को तोड़ने का, बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाने का, और स्कूल से लेकर कॉलेज तक शिक्षा को "व्यावहारिक" बनाने का। लेकिन आज, दो साल बाद, जब हम देश के सरकारी स्कूलों में झांकते हैं तो तस्वीर उतनी गुलाबी नहीं दिखती जितनी दिल्ली के एयर-कंडीशंड दफ्तरों से नज़र आती है।
कागज़ पर क्रांति, ज़मीन पर वही पुरानी कहानी
राजस्थान के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका रेखा देवी बताती हैं— "हमें NEP की ट्रेनिंग के लिए तीन दिन का एक वर्कशॉप मिला। उसके बाद वही पुरानी किताबें, वही पुराना सिलेबस और वही पुराना रटाई का तरीका।" यही हाल देश के लाखों सरकारी स्कूलों का है। NEP में बात की गई थी "खुशनुमा पाठशाला" (Joyful Learning) की, लेकिन जहाँ एक शिक्षक के कंधों पर 80-90 बच्चों की ज़िम्मेदारी हो, वहाँ "खुशी" एक विलासिता बन जाती है। नीति तो कह रही है कि बच्चे को 5+3+3+4 के नए ढांचे में पढ़ाओ, लेकिन टीचर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स (TTC) में अभी भी वही 1986 वाले पाठ्यक्रम चल रहे हैं।
प्राइवेट स्कूल बनाम सरकारी स्कूल — दो भारत की कहानी
दिल्ली के एक नामी प्राइवेट स्कूल में NEP के नाम पर "coding classes", "design thinking workshops" और "multilingual days" मनाए जा रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के एक गाँव में एक ही कमरे में कक्षा 1 से 5 तक के बच्चे एक साथ बैठकर पढ़ रहे हैं। यही है NEP का वो कड़वा सच — यह नीति उन्हीं के लिए काम करेगी जिनके पास पहले से संसाधन हैं। डिजिटल डिवाइड (Digital Divide) की बात करें तो देश के 40% सरकारी स्कूलों में आज भी इंटरनेट कनेक्शन नहीं है, और NEP की एक बड़ी उम्मीद — "डिजिटल लर्निंग" — इन स्कूलों के लिए एक सपना मात्र है।
शिक्षाविद् प्रोफेसर यशपाल की एक पुरानी बात आज भी उतनी ही सटीक है— "भारत में शिक्षा सुधार की सबसे बड़ी बाधा नीति नहीं, बल्कि नीयत और नियोजन की कमी है।" NEP अच्छी है, लेकिन बिना बजट और ईमानदार क्रियान्वयन के यह भी पिछली नीतियों की तरह फाइलों में धूल खाती रहेगी।
उम्मीद की किरण भी है
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। कुछ राज्यों में, खासकर केरल और हिमाचल प्रदेश में, NEP के तहत मातृभाषा में शिक्षा को लेकर सकारात्मक कदम उठाए गए हैं। IIT और NIT जैसे संस्थानों में "मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट" (Multiple Entry-Exit) की व्यवस्था धीरे-धीरे लागू हो रही है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब यह बदलाव बिहार के एक टूटे-फूटे सरकारी स्कूल तक पहुंचेगा जहाँ पहले शौचालय चाहिए, फिर "critical thinking" की बात होगी।
क्या आपके बच्चे या आपके इलाके के स्कूल में NEP का कोई असर दिखा है? या यह भी पिछली नीतियों की तरह बस एक और सरकारी दस्तावेज़ बनकर रह जाएगी? अपनी राय ज़रूर साझा करें।