जयपुर/इंदौर/कोयंबटूर, 9 मार्च 2021: एक वक्त था जब "स्टार्टअप" सुनते ही दिमाग में बस दो नाम आते थे — बेंगलुरु का कोरमंगला और गुरुग्राम का साइबर सिटी। लेकिन पिछले कुछ सालों में एक ऐसी खामोश क्रांति हो रही है जिसकी खबर मुंबई और दिल्ली के बड़े न्यूज़रूम तक ठीक से नहीं पहुंची। राजस्थान के जयपुर में "पिंक सिटी" के गुलाबी किले की छाया में एक Edutech स्टार्टअप ने पिछले साल ₹50 करोड़ की फंडिंग उठाई। मध्यप्रदेश के इंदौर में एक 24 साल के लड़के ने फसल बीमा की एक ऐप बनाई जो किसानों के बीच जंगल की आग की तरह फैल रही है। तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक महिला उद्यमी ने हैंडलूम उद्योग को ऑनलाइन लाकर 500 बुनकरों की ज़िंदगी बदल दी।
छोटे शहर, बड़े सपने — और अब बड़ी फंडिंग भी
NASSCOM की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि 2020 के बाद से Tier-2 और Tier-3 शहरों में स्टार्टअप की संख्या में 40% की बढ़ोतरी हुई है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है — COVID-19 का वो अप्रत्याशित तोहफा जिसे "Work From Home" कहते हैं। जब मुंबई और बेंगलुरु के ऑफिस बंद हुए, तो लाखों प्रतिभाशाली युवा अपने घर — लखनऊ, नागपुर, सूरत, विशाखापट्टनम — लौट गए। और वहाँ उन्होंने देखा कि उनके शहर में भी समस्याएं हैं, बाज़ार है, और ज़रूरत है एक ऐसे समाधान की जो बड़े महानगरों की टेम्पलेट पर नहीं, बल्कि स्थानीय ज़रूरत पर बना हो।
लागत कम, प्रतिभा वही
एक दिलचस्प बात यह है कि बेंगलुरु में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की तनख्वाह और किराये को मिलाकर जो खर्च होता है, उसके आधे में इंदौर या जयपुर में उतना ही काम हो जाता है। और अब जब 5G इंटरनेट Tier-2 शहरों में भी दस्तक दे रहा है, तो प्रतिभाशाली लोगों को महंगे महानगरों में जाने की मजबूरी नहीं रही। इसी का फायदा उठाकर कई VCs (Venture Capitalists) और Angel Investors अब जयपुर और भुवनेश्वर में roadshows कर रहे हैं — जो पाँच साल पहले अकल्पनीय था।
इंदौर के स्टार्टअप फाउंडर अभिषेक शर्मा कहते हैं— "हमने बेंगलुरु में नहीं, इंदौर में ऑफिस खोला। यहाँ टैलेंट है, खाना सस्ता है, ज़िंदगी की quality बेहतर है। और हाँ, यहाँ ट्रैफिक में 2 घंटे बर्बाद नहीं होते, वो वक्त काम में लगता है।"
चुनौतियाँ अभी भी हैं
हालांकि यह तस्वीर उत्साहजनक है, लेकिन छोटे शहरों के स्टार्टअप्स को अभी भी mentorship, quality hiring, और exit opportunities की कमी खलती है। बड़े VCs अभी भी बेंगलुरु-मुंबई की पहली वाली कंपनियों को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन जिस रफ्तार से बदलाव आ रहा है, उससे लगता है कि अगले पाँच सालों में भारत का अगला "Unicorn" किसी बड़े शहर से नहीं, बल्कि किसी छोटे शहर के एक गैरेज से निकलेगा।
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